Friday, October 23, 2009
मन परैत अछि
मन परैत अछि रामप्रसाद
आ॓ रामप्रसाद
जेकर पिता आ पितामह
हमर पितामहक हरवाहा छल
मन परैत अछि
हुनकर हर
जकरा सं खेत जोतैक छल
भोर आ॓ सांझ
ताहि दिन कतेक
मन लगैत रहैक गाम मे
आ॓हि हर मे जोतैत छल
दू टा बरद
बरद के घंटी
आबो बाजैत अछि कान मे
मन परैत अछि
जखन धान काटि कऽ
बोझ राखल रहै आंगन
आ दुआरि पर
मुदा, समय बीतल
नहि रहल आब रामप्रसाद
नहि रहल आब पितामह
नहि रहल आब दुआरि पर हर आ बरद
गाम मे ट्रक्टर आबि गेल
थ्रेसर सऽ आबि काज होइत अछि
ताहि सं नहि नींद टूटैत अछि घंटी सं
आ नहि बोझ रखाइत अछि आंगन मे।
Sunday, January 25, 2009
मिथिला की नायाब लोकशैली : भगैत
मिथिला जगत में कई ऐसे कलाकार हैं, कई ऐसी शैली है, कई ऐसे रीति- रिवाज हैं जिसे देख कर और महसूस कर न सिर्फ़ मिथिला के लोग बल्कि दूसरे इलाके के लोग दांतों तले उंगली दबाने के लिए मजबूर होते हैं। पूरी तरह खेती पर जीवन-यापन करने वाली यहाँ की विभिन्न बिरादरी की जिन्दगी खेत-खलियान और नदी-नाले से शुरू होकर यही ख़तम हो जाती है। जिसने बाहर की दुनिया देखी उल्टे मुहँ लौट कर अतीत को याद करना गवारा लगा।
ऐसे में उनके पास पेट की भूख शांत करने के लिए गेहूं तो था लेकिन मन की भूख शांत करने के लिए सेक्स के अलावा शायद ही कुछ रहा होगा। यही वो हालात थे जब सेक्स से मन भर जाने पर लोगों ने जाने-अनजाने पाप और पुण्य जैसे दो शब्दों को इजाद दिया और इसी क्रम में मिथिला में भगैत (भगत) जैसे गायन और नाट्य शैली का विकास हुआ होगा। धीरे-धीरे लोग इससे जुड़ते गए और यह सिर्फ़ मिथिला में ही नही बल्कि नेपाल और पश्चिम बंगाल में भी अपनी पैठ बना ली। हालाँकि जानकारों का मानना है की १९वीं शताब्दी से पहले मिथिला में इस पारंपरिक लोक-शैली का विकास हुआ है, बावजूद इसके, इसे लेकर कहीं भी कोई लिखित विवरण नही मिलता है।
वर्तमान दौर में भी मिथिला के गावों के लोगों का भगैत पर अटूट विश्वास है और माना जाता है की इसके आयोजन के मौके पर देवपुरुष अप्रत्यक्ष रूप से उपस्थित होते हैं। ऐसे देवपुरुषों की संख्या करीब दो दर्जन है जिनमें धर्मराज, राजा चैयां, ज्योति, कारू महाराज, मीरा साहेब, बिसहैर, बेनी, अन्दू बाबा, गहील, हरिया डोम, बरहम, खिरहैर प्रमुख हैं। स्वच्छता और पवित्रता की इसके आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
वैसे तो नाटक का मतलब वास्तविकता के भ्रम को उत्पन्न करना होता है लेकिन भगैत में इससे जुड़े लोगों को वास्तविकता का अहसास होता है। उनकी मान्यता है कि इस पर अविश्वास करने पर महापाप लगता है। इस तरह की अटूट धारणा दुनिया की मुट्ठी भर शैली या विधा में ही देखने को मिलता है। जहाँ पर भगैत होता है, उस मंडली में जो आगे-आगे गाता है उसे पंजियार या मूलगैन कहा जाता है। बाकी गायक को भगैतिया कहा जाता है। मूलगैन कहानी प्रारंभ करता है और फिर समां bandh जाता है।
भगैत के गीत, गायन और गति तेज और सुर ऊंचा होता है। हारमोनियम, ढ़ोलक, झालि, खंजरी, डुगडुगी वातावरण में रस का संचार करते हैं। भगैत के शुरू होने पर भगैतिया लोग बीच-बीच में अपने कान में उंगली डाल कर बहुत ऊंचे स्वर को साधते हैं। आयोजन के दौरान जिस व्यक्ति के शरीर में देवपुरूष का प्रवेश होता है उसे भगता कहा जाता है। गायन के क्रम में भगता के शरीर में जब देवपुरूष का प्रवेश होता है तो शरीर कंपाने लगता है और वह देवपुरूष जैसा व्यवहार करने लगता है।
भगैत की यह शैली अदभुत रूप से जाति-वर्ण से ऊपर उठकर वर्तमान दौर में भी कायम है। भगैत मंडली में सभी वर्ग, सभी धर्म और सभी जातिके लोग शामिल होते हैं। यही कारण है कि देवपुरूषओं में डोम जाति के हरिया डोम तो मुस्लिम संप्रदाय के मीरा साहेब का नाम शामिल है। भगैत गायक में मुनेश्वर यादव, नटाय पंजियार, भोलन यादव, देखी यादव, रेवती भगता, अर्जुन यादव, बेनी साह, नागो भगता, तुलसी भगता प्रमुख हैं। सबसे अहम् बात यह है कि इस पूरे कार्यक्रम के लिए कोई भी भगैत किसी भी तरह का पारिश्रमिक नही लेता।
Wednesday, December 24, 2008
हम हुनकर छी
हम हुनकर छी
जिनका स
रूप आ रंग पेने छी
हम हुनकर छी
जिनका स
संस्कार आ मर्यादा पेने छी
हम हुनकर छी
जिनका स
अक्षर आ शब्द पेने छी
हम हुनकर छी
जिनका स
कदम आ ताल पेने छी
मुदा, हम हुनका स अलग छी
जिनकर ओछापन आ छिछलापन
आत्माक आगू खसबाक लेल मजबूर करैत छथि।
Saturday, October 18, 2008
इन्द्रप्रस्थक कथा
युग-युग सं
लिखल जा
रहल छैक
इन्द्रप्रस्थक कथा
द्वापर मे
अहि ठाम
छल पांडवक
राजधानी
जकरा पावैक लेल
अठाराह दिन तक
भएल महाभारत
मारल गेल हजारों लोक
समय बदलल
आब नहि छथि ओ पांडव
नहि ओ कौरव
मुदा, आबो मारल जाइत अछि लोक
तहिया उजड़ि गेल छल
गामक-गाम
आई कामनवेल्थक नाम पर
उजड़ि रहल छैक गरीबक झोपड़ी
हम पूछैत छी
शिखंडीक आगू कs
रचल गेल छल षड्यंत्र
सत्ताक लेल
भाई-भाई कs
दुश्मन भेल
मारि-काटि कs
करलक वंशक नाश
आब अहि इन्द्रप्रस्थ मे
वर्ल्ड क्लासक नाम पर
रचल जाइ अछि षड्यंत्र
गरीब कए भगाबैक लेल.
Thursday, September 18, 2008
नहि टाइम अपना लेल
नेना मे
गाम-घर मे
सुनैति रहि
नौकरी
नहि करी
तखन तs
एक कान से सुनि
दोसर कान
सs
उड़ा दैत रहि
मुदा,
जखन सs
नौकरी केलहुं अछि
बुझाब मे आबि गेल
नौकरीक भाव
नहि अपन
ठाम अs ठिकाना
जतय
कंपनी पठैलक
वहि ठाम ओ ठिकाना
नहि सुतैक टाइम
नहि उठैक लेल टाइम
नहि खाइक लेल टाइम
नहि टाइम अपना लेल
यहि छै नौकरी.
पार्टनर, अहांक मूल की
अहां कs मन छथि
कवि मुक्तिबोध
जखन हुनका
कियो नव लोक भेटति छलैन
तs पुछथिन
पार्टनर, अहांक पालिटिक्स की
आब तs
मुक्तिबोध नहि छथि
मुदा, मिथिला मे हुनकर गप
घर-घर मे
अहां सुनि
सकैत छी
ई गप जखन-तखन
नहि सुनबहि
मुदा, ब्याह-दानक
घटकैति मे
सुनबहि जरूर
पार्टनर, अहांक मूल की
अहांकs एहि गप मे
अंतर किछु
नहि लागत
मुदा, जमीन आ आसमानक
फ़र्क छैक
मुक्तिबोधक गप मे मानसिक आ
वैचारिक स्तर देखबा मे आबैत छल
जखन कि मिथिलाक संस्कार मे
निखटुओ जे छथि
पूर्वजक गुणगान मे
पेटकुनिया धेने भेटताह
एकटा गप
पुछै छी
आब कि
राजतंत्र छैक
जे राजाक बेटा
राजा होइत.
Thursday, June 7, 2007
स्वयं से संवाद
कतेक दिन सँ सोचैत छी
सोचिते रही जाईत छी स्वयं के किछु कहब
किछु सुनाब स्वयं सँ नियारैत छी कतेक बेर
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.....................................
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आब गप्प करैया पड़त खुलि कई
निकलिया पड़त समय
स्वयं सँ संवादक बात आब
तरल नही जा सकैई बेशी दिन.